Hindi Historical Story - Vigalit Karuna
Hindi fiction story based on ancient period Nalanda University. A student from Nalanda University who came from Kashi and studied there . There he met an ordinary girl from other religion who wanted to serve Bhagwan Buddha Tathagata. But Nalanda University was women prohibited. She didn't get chance to entre the main gate of Nalanda University . This student wanted to help her but he was too helpless. This story narrated between mankind and rule and discipline .
Story Synopsis
भारतवर्ष की अधुना बिहार की पटभूमि जहा स्थित थी इतिहास की सर्बस्रेष्ठ बिश्वविद्यालय नालंदा महाबिहार ... जिसकी गौरवगाथा आज भी स्वर्णाक्षर में लिखे जाते है ... आज भी उस भग्न्स्तूप पे अगर कान राखी जाएँ तो पुराकाल बातें करते है ... वोह युग तो बीत गए जब इसी बिश्वविद्यालय की इमारतें देश-विदेश से आई हुई छात्राओ की अध्यायन से गूंज उठते थे ... आज भी यहाँ की हवाओ में श्री गौतम बुद्ध की वाणी महेकती है ... जो छात्राए यहाँ पढ़ने आते थे वोह अपने आपको धन्य समझते थे ... नालंदा महाबिहार की शिक्षक मण्डली तथा प्रधान अध्यक्ष शीलभद्र की कड़ी निगरानी में यहाँ के छात्राए श्रेष्ट शिक्षा प्राप्त होते थे जिससे आगे चलकर वे केवल अच्छे और सर्बज्ञ ज्ञानी ही नही साधना प्राप्त श्रेष्ट तथा पूज्य सन्यासी के रूप में भी परिचित होते थे ..
येही महाबिहार में पढ़ने आए काशी से अनंत नामके एक छात्र ... बौद्ध धर्म को अपनाकर मुंडित मस्तक , नारंगी भेस कौपीन धारी अनंत अपने ध्यान , ज्ञान और कर्म निछावर करने में लीन है भगवन बुद्ध के चरणों में .. नालंदा महाबिहार के रीति-नीति वोह सकुशल अपना चुके है ... परन्तु कुछ दिनों से यह क्या हो रहा है अनंत के साथ ! क्यूँ उसका मन इतना विचलित है ! जो इच्छा पूर्ति हेतु अनंत इस महाबिहार में आए थे वोही तो हो रहा है ... बौद्ध धर्म का सेवा करना , उनके अनुशासन को मान्यता देना , श्रद्धा पूर्वक उनका पालन करना - येही तो चाहता था अनंत और येही तो हो रहा है .. तो उसका मन पाठ में निवेश क्यूँ नही है ! इसके कारण क्या प्रातः में हुई महाबिहार के प्रांगन की घटना है ! जो अनंत के मन में बार बार आघात कर रहे है ! अनंत अपनी माता की आज्ञा की पालन हेतु इस बिहार में आए थे क्या आज उसकी माता की कही गयी कथन के अन्यथा होता हुआ प्रतीत हो रहा है !
By
P. Sarkar
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